Author: Premchand
Sevasadan(सेवासदन)
"सेवासदन" Premchand का प्रथम प्रमुख सामाजिक उपन्यास है। इसमें तत्कालीन भारतीय समाज में दहेज-प्रथा, अनमेल विवाह, स्त्री-शोषण, वेश्यावृत्ति तथा नारी-जीवन की समस्याओं का अत्यंत यथार्थ और संवेदनशील चित्रण किया गया है। यह उपन्यास मूलतः उर्दू में "बाज़ार-ए-हुस्न" नाम से लिखा गया था, जिसका बाद में हिंदी रूप "सेवासदन" के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
उपन्यास की मुख्य पात्र सुमन एक सुंदर, शिक्षित और स्वाभिमानी युवती है। दहेज के अभाव में उसका विवाह उससे कहीं अधिक आयु के एक कठोर और असंगत स्वभाव वाले व्यक्ति से कर दिया जाता है। वैवाहिक जीवन में उपेक्षा, असंतोष और अपमान के कारण परिस्थितियाँ उसे वेश्यावृत्ति की ओर धकेल देती हैं। समय के साथ उसे अपने जीवन की भूल का एहसास होता है और वह समाजोपयोगी जीवन जीने का निश्चय करती है। अंततः वह सेवासदन नामक संस्था से जुड़कर निराश्रित और पीड़ित महिलाओं की सेवा में स्वयं को समर्पित कर देती है।
प्रेमचंद ने इस उपन्यास के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि समाज की कुरीतियाँ ही अनेक स्त्रियों को दुखद परिस्थितियों में धकेलती हैं। उन्होंने नारी-सम्मान, शिक्षा, आत्मनिर्भरता और सामाजिक सुधार की आवश्यकता पर बल दिया है।
"सेवासदन" का मुख्य संदेश यह है कि समाज में स्त्री को सम्मान, समान अवसर और न्याय मिलना चाहिए तथा दहेज, अनमेल विवाह और सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन आवश्यक है। यह उपन्यास नारी-जीवन, सामाजिक सुधार और मानवीय संवेदना का सशक्त दस्तावेज़ है।
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ISBN : 978-93-7670-896-3
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Publication: Kitabking
Description:
"सेवासदन" Premchand का प्रथम प्रमुख सामाजिक उपन्यास है। इसमें तत्कालीन भारतीय समाज में दहेज-प्रथा, अनमेल विवाह, स्त्री-शोषण, वेश्यावृत्ति तथा नारी-जीवन की समस्याओं का अत्यंत यथार्थ और संवेदनशील चित्रण किया गया है। यह उपन्यास मूलतः उर्दू में "बाज़ार-ए-हुस्न" नाम से लिखा गया था, जिसका बाद में हिंदी रूप "सेवासदन" के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
उपन्यास की मुख्य पात्र सुमन एक सुंदर, शिक्षित और स्वाभिमानी युवती है। दहेज के अभाव में उसका विवाह उससे कहीं अधिक आयु के एक कठोर और असंगत स्वभाव वाले व्यक्ति से कर दिया जाता है। वैवाहिक जीवन में उपेक्षा, असंतोष और अपमान के कारण परिस्थितियाँ उसे वेश्यावृत्ति की ओर धकेल देती हैं। समय के साथ उसे अपने जीवन की भूल का एहसास होता है और वह समाजोपयोगी जीवन जीने का निश्चय करती है। अंततः वह सेवासदन नामक संस्था से जुड़कर निराश्रित और पीड़ित महिलाओं की सेवा में स्वयं को समर्पित कर देती है।
प्रेमचंद ने इस उपन्यास के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि समाज की कुरीतियाँ ही अनेक स्त्रियों को दुखद परिस्थितियों में धकेलती हैं। उन्होंने नारी-सम्मान, शिक्षा, आत्मनिर्भरता और सामाजिक सुधार की आवश्यकता पर बल दिया है।
"सेवासदन" का मुख्य संदेश यह है कि समाज में स्त्री को सम्मान, समान अवसर और न्याय मिलना चाहिए तथा दहेज, अनमेल विवाह और सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन आवश्यक है। यह उपन्यास नारी-जीवन, सामाजिक सुधार और मानवीय संवेदना का सशक्त दस्तावेज़ है।
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