Samyawad Hi Kyon(साम्यवाद ही क्यों)

"साम्यवाद ही क्यों" Rahul Sankrityayan की एक प्रसिद्ध वैचारिक कृति है, जिसमें उन्होंने साम्यवाद के सिद्धांतों और उसकी आवश्यकता का सरल एवं तर्कपूर्ण विवेचन किया है। लेखक का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता, शोषण, बेरोज़गारी और गरीबी जैसी समस्याओं का स्थायी समाधान साम्यवादी व्यवस्था के माध्यम से संभव हो सकता है।

पुस्तक में राहुल सांकृत्यायन पूँजीवादी व्यवस्था की आलोचना करते हुए बताते हैं कि उत्पादन के साधनों पर कुछ लोगों का अधिकार होने से धन और संसाधनों का असमान वितरण होता है। इसके परिणामस्वरूप श्रमिक वर्ग का शोषण बढ़ता है और सामाजिक विषमता गहराती है। इसके विपरीत, साम्यवाद समानता, श्रम के सम्मान, सामूहिक स्वामित्व और सामाजिक न्याय पर आधारित व्यवस्था का समर्थन करता है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को उसकी आवश्यकता और क्षमता के अनुसार अवसर प्राप्त हों।

लेखक शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तर्कशीलता और सामाजिक सहयोग को प्रगतिशील समाज की आधारशिला मानते हैं। वे यह भी बताते हैं कि किसी भी समाज का विकास तभी संभव है, जब शोषण और भेदभाव समाप्त हों तथा सभी नागरिकों को समान अधिकार और सम्मान मिले।

इस पुस्तक का मुख्य संदेश यह है कि समानता, सामाजिक न्याय और श्रम के सम्मान पर आधारित समाज ही मानवता के लिए अधिक न्यायपूर्ण और कल्याणकारी हो सकता है। यह कृति पाठकों को आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्थाओं पर विचार करने तथा तर्कसंगत दृष्टि विकसित करने की प्रेरणा देती है।

₹ 160.00 ₹199

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ISBN : 978-93-7670-534-4

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Publication: Kitabking
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"साम्यवाद ही क्यों" Rahul Sankrityayan की एक प्रसिद्ध वैचारिक कृति है, जिसमें उन्होंने साम्यवाद के सिद्धांतों और उसकी आवश्यकता का सरल एवं तर्कपूर्ण विवेचन किया है। लेखक का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता, शोषण, बेरोज़गारी और गरीबी जैसी समस्याओं का स्थायी समाधान साम्यवादी व्यवस्था के माध्यम से संभव हो सकता है।

पुस्तक में राहुल सांकृत्यायन पूँजीवादी व्यवस्था की आलोचना करते हुए बताते हैं कि उत्पादन के साधनों पर कुछ लोगों का अधिकार होने से धन और संसाधनों का असमान वितरण होता है। इसके परिणामस्वरूप श्रमिक वर्ग का शोषण बढ़ता है और सामाजिक विषमता गहराती है। इसके विपरीत, साम्यवाद समानता, श्रम के सम्मान, सामूहिक स्वामित्व और सामाजिक न्याय पर आधारित व्यवस्था का समर्थन करता है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को उसकी आवश्यकता और क्षमता के अनुसार अवसर प्राप्त हों।

लेखक शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तर्कशीलता और सामाजिक सहयोग को प्रगतिशील समाज की आधारशिला मानते हैं। वे यह भी बताते हैं कि किसी भी समाज का विकास तभी संभव है, जब शोषण और भेदभाव समाप्त हों तथा सभी नागरिकों को समान अधिकार और सम्मान मिले।

इस पुस्तक का मुख्य संदेश यह है कि समानता, सामाजिक न्याय और श्रम के सम्मान पर आधारित समाज ही मानवता के लिए अधिक न्यायपूर्ण और कल्याणकारी हो सकता है। यह कृति पाठकों को आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्थाओं पर विचार करने तथा तर्कसंगत दृष्टि विकसित करने की प्रेरणा देती है।

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Rahul Sankrityayan

Rahul Sankrityayan (1893–1963) was one of India\'s greatest scholars, writers, historians, and travelers. Often called the \"Father of Hindi Travel Literature,\" he made significant contributions to Hindi literature through his travelogues, novels, essays, and historical works. A polyglot who knew several languages, he traveled extensively across Asia, especially Tibet, where he collected rare Buddhist manuscripts. His writings reflect deep knowledge of history, philosophy, culture, and social issues. Some of his notable works include *Volga Se Ganga*, *Meri Jeevan Yatra*, and *Darshan-Digdarshan*. Rahul Sankrityayan played a vital role in enriching modern Hindi literature and promoting intellectual thought in India.\r\n
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