Pratigya(प्रतिज्ञा)

"प्रतिज्ञा" Premchand का एक प्रसिद्ध सामाजिक उपन्यास है। इस उपन्यास में समाज में व्याप्त विधवा-विवाह, रूढ़िवाद, जातिगत भेदभाव और सामाजिक कुरीतियों का यथार्थ चित्रण किया गया है। प्रेमचंद ने समाज-सुधार की भावना को कथा के माध्यम से अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है।

उपन्यास का मुख्य पात्र अमृतराय एक शिक्षित, उदार और समाज-सुधारवादी युवक है। वह समाज में विधवाओं की दयनीय स्थिति देखकर संकल्प लेता है कि वह एक विधवा से विवाह करेगा और इस कुप्रथा के विरुद्ध उदाहरण प्रस्तुत करेगा। उसके इस निर्णय का परिवार और समाज के अनेक लोग विरोध करते हैं, क्योंकि उस समय विधवा-विवाह को सामाजिक मान्यता प्राप्त नहीं थी। अनेक कठिनाइयों, विरोध और संघर्षों के बावजूद अमृतराय अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहता है और अपने आदर्शों से समझौता नहीं करता।

प्रेमचंद ने इस उपन्यास के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि समाज में परिवर्तन केवल उपदेशों से नहीं, बल्कि साहसपूर्ण कर्मों और आदर्श आचरण से संभव है। उन्होंने स्त्री के सम्मान, समान अधिकार और मानवीय गरिमा का समर्थन किया है तथा रूढ़ियों के स्थान पर विवेक और मानवता को महत्व दिया है।

"प्रतिज्ञा" का मुख्य संदेश यह है कि सामाजिक कुरीतियों का विरोध कर समानता, न्याय और मानवता की स्थापना करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है। यह उपन्यास समाज-सुधार, नैतिक साहस और मानवीय मूल्यों की प्रेरणादायक कृति है।

 
 

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ISBN : 978-81-996879-2-9

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Publication: Kitabking
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"प्रतिज्ञा" Premchand का एक प्रसिद्ध सामाजिक उपन्यास है। इस उपन्यास में समाज में व्याप्त विधवा-विवाह, रूढ़िवाद, जातिगत भेदभाव और सामाजिक कुरीतियों का यथार्थ चित्रण किया गया है। प्रेमचंद ने समाज-सुधार की भावना को कथा के माध्यम से अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है।

उपन्यास का मुख्य पात्र अमृतराय एक शिक्षित, उदार और समाज-सुधारवादी युवक है। वह समाज में विधवाओं की दयनीय स्थिति देखकर संकल्प लेता है कि वह एक विधवा से विवाह करेगा और इस कुप्रथा के विरुद्ध उदाहरण प्रस्तुत करेगा। उसके इस निर्णय का परिवार और समाज के अनेक लोग विरोध करते हैं, क्योंकि उस समय विधवा-विवाह को सामाजिक मान्यता प्राप्त नहीं थी। अनेक कठिनाइयों, विरोध और संघर्षों के बावजूद अमृतराय अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहता है और अपने आदर्शों से समझौता नहीं करता।

प्रेमचंद ने इस उपन्यास के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि समाज में परिवर्तन केवल उपदेशों से नहीं, बल्कि साहसपूर्ण कर्मों और आदर्श आचरण से संभव है। उन्होंने स्त्री के सम्मान, समान अधिकार और मानवीय गरिमा का समर्थन किया है तथा रूढ़ियों के स्थान पर विवेक और मानवता को महत्व दिया है।

"प्रतिज्ञा" का मुख्य संदेश यह है कि सामाजिक कुरीतियों का विरोध कर समानता, न्याय और मानवता की स्थापना करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है। यह उपन्यास समाज-सुधार, नैतिक साहस और मानवीय मूल्यों की प्रेरणादायक कृति है।

 
 

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Premchand

Munshi Premchand (1880–1936) was one of the greatest writers in Hindi and Urdu literature. Munshi Premchand is often called the \"Upanyas Samrat\" (Emperor of Novels) for his outstanding contribution to Indian literature. His real name was Dhanpat Rai Srivastava, and he initially wrote under the pen name \"Nawab Rai.\"\r\n\r\nPremchand\'s works focused on social issues such as poverty, caste discrimination, exploitation of peasants, women\'s rights, and moral values. His writing was known for its realism and deep understanding of rural Indian life.
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