Author: Bankimchand
Kapal Kundla(कपालकुंडला)
'कपालकुंडला' बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का प्रसिद्ध सामाजिक-रोमांटिक उपन्यास है, जिसका प्रकाशन 1866 में हुआ। यह उपन्यास प्रेम, त्याग, धर्म, मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक जीवन के संघर्षों का अत्यंत मार्मिक चित्रण करता है। इसमें प्रकृति और सभ्यता, निष्कपट प्रेम तथा सामाजिक बंधनों के बीच के द्वंद्व को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
उपन्यास की नायिका कपालकुंडला एक सुंदर और सरल हृदय युवती है, जिसका पालन-पोषण एक कापालिक साधु ने जंगल में किया है। संयोगवश उसकी भेंट नवकुमार से होती है और दोनों का विवाह हो जाता है। विवाह के बाद कपालकुंडला समाज के रीति-रिवाजों और पारिवारिक जीवन के अनुरूप स्वयं को ढालने का प्रयास करती है, किंतु उसका निष्कपट स्वभाव और अनुभवहीनता उसे अनेक कठिन परिस्थितियों में डाल देते हैं। कापालिक की कुटिल योजनाएँ और परिस्थितियों का दबाव अंततः उसके जीवन को दुखद मोड़ पर पहुँचा देता है।
इस उपन्यास के माध्यम से बंकिमचंद्र ने प्रेम, विश्वास, त्याग, स्त्री-जीवन और सामाजिक मर्यादाओं का अत्यंत संवेदनशील चित्रण किया है। 'कपालकुंडला' यह संदेश देती है कि सच्चा प्रेम, नैतिकता और मानवता जीवन के सर्वोच्च मूल्य हैं। अपनी रोचक कथा, सशक्त चरित्र-चित्रण और भावपूर्ण शैली के कारण यह बांग्ला तथा भारतीय साहित्य की अमर कृतियों में गिनी जाती है।
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ISBN : 978-81-996879-4-3
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Publication: Kitabking
Description:
'कपालकुंडला' बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का प्रसिद्ध सामाजिक-रोमांटिक उपन्यास है, जिसका प्रकाशन 1866 में हुआ। यह उपन्यास प्रेम, त्याग, धर्म, मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक जीवन के संघर्षों का अत्यंत मार्मिक चित्रण करता है। इसमें प्रकृति और सभ्यता, निष्कपट प्रेम तथा सामाजिक बंधनों के बीच के द्वंद्व को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
उपन्यास की नायिका कपालकुंडला एक सुंदर और सरल हृदय युवती है, जिसका पालन-पोषण एक कापालिक साधु ने जंगल में किया है। संयोगवश उसकी भेंट नवकुमार से होती है और दोनों का विवाह हो जाता है। विवाह के बाद कपालकुंडला समाज के रीति-रिवाजों और पारिवारिक जीवन के अनुरूप स्वयं को ढालने का प्रयास करती है, किंतु उसका निष्कपट स्वभाव और अनुभवहीनता उसे अनेक कठिन परिस्थितियों में डाल देते हैं। कापालिक की कुटिल योजनाएँ और परिस्थितियों का दबाव अंततः उसके जीवन को दुखद मोड़ पर पहुँचा देता है।
इस उपन्यास के माध्यम से बंकिमचंद्र ने प्रेम, विश्वास, त्याग, स्त्री-जीवन और सामाजिक मर्यादाओं का अत्यंत संवेदनशील चित्रण किया है। 'कपालकुंडला' यह संदेश देती है कि सच्चा प्रेम, नैतिकता और मानवता जीवन के सर्वोच्च मूल्य हैं। अपनी रोचक कथा, सशक्त चरित्र-चित्रण और भावपूर्ण शैली के कारण यह बांग्ला तथा भारतीय साहित्य की अमर कृतियों में गिनी जाती है।