Ghumakkar Shastra(घुमक्कड़ शास्त्र)

घुमक्कड़ शास्त्र' महापंडित राहुल सांकृत्यायन की अत्यंत प्रसिद्ध विचारप्रधान कृति है, जिसमें उन्होंने घुमक्कड़ी को केवल यात्रा नहीं, बल्कि ज्ञान, अनुभव और आत्मविकास का श्रेष्ठ साधन बताया है। यह पुस्तक युवाओं को संसार को अपनी आँखों से देखने, नई संस्कृतियों को समझने और संकीर्ण सोच से मुक्त होकर व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देती है।

राहुल सांकृत्यायन के अनुसार घुमक्कड़ व्यक्ति किसी जाति, धर्म, भाषा या देश की सीमाओं में बंधा नहीं होता। वह पूरी मानवता को अपना परिवार मानता है और अपने अनुभवों से स्वयं भी समृद्ध होता है तथा समाज को भी समृद्ध बनाता है। लेखक का मानना है कि यात्राएँ मनुष्य में साहस, आत्मनिर्भरता, सहनशीलता, जिज्ञासा और विवेक का विकास करती हैं। वे युवाओं से आह्वान करते हैं कि वे जीवन के सुनहरे वर्षों में अधिक से अधिक भ्रमण करें, क्योंकि प्रत्यक्ष अनुभव से प्राप्त ज्ञान पुस्तकीय ज्ञान से कहीं अधिक स्थायी और व्यापक होता है।

इस पुस्तक का मुख्य संदेश है कि घुमक्कड़ी मानव सभ्यता के विकास का महत्वपूर्ण आधार रही है। नई खोजें, ज्ञान का आदान-प्रदान और सांस्कृतिक विकास यात्राओं के माध्यम से ही संभव हुए हैं। 'घुमक्कड़ शास्त्र' केवल यात्रा-वृत्तांत नहीं, बल्कि जीवन को साहस, जिज्ञासा, स्वतंत्र चिंतन और विश्व-बंधुत्व की भावना के साथ जीने की प्रेरणा देने वाली अमूल्य कृति है।

₹ 270.00 ₹349

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ISBN : 978-93-7670-155-1

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Publication: Kitabking
Description:

घुमक्कड़ शास्त्र' महापंडित राहुल सांकृत्यायन की अत्यंत प्रसिद्ध विचारप्रधान कृति है, जिसमें उन्होंने घुमक्कड़ी को केवल यात्रा नहीं, बल्कि ज्ञान, अनुभव और आत्मविकास का श्रेष्ठ साधन बताया है। यह पुस्तक युवाओं को संसार को अपनी आँखों से देखने, नई संस्कृतियों को समझने और संकीर्ण सोच से मुक्त होकर व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देती है।

राहुल सांकृत्यायन के अनुसार घुमक्कड़ व्यक्ति किसी जाति, धर्म, भाषा या देश की सीमाओं में बंधा नहीं होता। वह पूरी मानवता को अपना परिवार मानता है और अपने अनुभवों से स्वयं भी समृद्ध होता है तथा समाज को भी समृद्ध बनाता है। लेखक का मानना है कि यात्राएँ मनुष्य में साहस, आत्मनिर्भरता, सहनशीलता, जिज्ञासा और विवेक का विकास करती हैं। वे युवाओं से आह्वान करते हैं कि वे जीवन के सुनहरे वर्षों में अधिक से अधिक भ्रमण करें, क्योंकि प्रत्यक्ष अनुभव से प्राप्त ज्ञान पुस्तकीय ज्ञान से कहीं अधिक स्थायी और व्यापक होता है।

इस पुस्तक का मुख्य संदेश है कि घुमक्कड़ी मानव सभ्यता के विकास का महत्वपूर्ण आधार रही है। नई खोजें, ज्ञान का आदान-प्रदान और सांस्कृतिक विकास यात्राओं के माध्यम से ही संभव हुए हैं। 'घुमक्कड़ शास्त्र' केवल यात्रा-वृत्तांत नहीं, बल्कि जीवन को साहस, जिज्ञासा, स्वतंत्र चिंतन और विश्व-बंधुत्व की भावना के साथ जीने की प्रेरणा देने वाली अमूल्य कृति है।

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Rahul Sankrityayan

Rahul Sankrityayan (1893–1963) was one of India\'s greatest scholars, writers, historians, and travelers. Often called the \"Father of Hindi Travel Literature,\" he made significant contributions to Hindi literature through his travelogues, novels, essays, and historical works. A polyglot who knew several languages, he traveled extensively across Asia, especially Tibet, where he collected rare Buddhist manuscripts. His writings reflect deep knowledge of history, philosophy, culture, and social issues. Some of his notable works include *Volga Se Ganga*, *Meri Jeevan Yatra*, and *Darshan-Digdarshan*. Rahul Sankrityayan played a vital role in enriching modern Hindi literature and promoting intellectual thought in India.\r\n
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