Vayam Rakshama(वयं रक्षामा:0

'वयं रक्षामः' आचार्य चतुरसेन की एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक-पौराणिक कृति है, जिसमें प्राचीन भारत की सभ्यता, संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था, राजनीतिक संघर्ष और आर्य-अनार्य संबंधों का विस्तृत चित्रण किया गया है। उपन्यास की कथा उस काल को सामने लाती है, जब विभिन्न जातियों, समुदायों और संस्कृतियों के बीच सत्ता, प्रतिष्ठा और अस्तित्व को लेकर संघर्ष चल रहा था।

कहानी में देव, दैत्य, दानव, नाग, यक्ष और आर्य जैसी विभिन्न सभ्यताओं एवं समुदायों के जीवन का वर्णन मिलता है। लेखक ने इनके माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया है कि प्राचीन समाज केवल एकरूप नहीं था, बल्कि उसमें अनेक संस्कृतियाँ, परंपराएँ और जीवन-दृष्टियाँ साथ-साथ विकसित हो रही थीं। विभिन्न समूहों के बीच संघर्ष के साथ-साथ उनके बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान और संबंधों को भी कथा में स्थान दिया गया है।

उपन्यास में रावण का चरित्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। लेखक ने उसे केवल एक पौराणिक खलनायक के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि एक शक्तिशाली, विद्वान, महत्वाकांक्षी और जटिल व्यक्तित्व के रूप में चित्रित किया है। उसके व्यक्तित्व में नेतृत्व, ज्ञान, पराक्रम और सत्ता की तीव्र इच्छा के साथ-साथ अहंकार और महत्वाकांक्षा भी दिखाई देती है। उसके संघर्षों के माध्यम से उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों और शक्ति-संतुलन को समझने का अवसर मिलता है।

आचार्य चतुरसेन ने इस कृति में इतिहास, पुराण, कल्पना और सामाजिक विश्लेषण का सुंदर संयोजन किया है। वे प्राचीन समाज की जीवन-पद्धति, धार्मिक विश्वासों, पारिवारिक संबंधों, युद्ध-कौशल, स्त्री-पुरुष संबंधों और सांस्कृतिक परंपराओं का विस्तृत चित्र प्रस्तुत करते हैं।

'वयं रक्षामः' का मूल संदेश यह है कि इतिहास को केवल विजेताओं की दृष्टि से नहीं, बल्कि विभिन्न समुदायों और संस्कृतियों के दृष्टिकोण से भी समझना चाहिए। यह कृति पाठकों को प्राचीन भारतीय सभ्यता के विविध रूपों, सत्ता-संघर्षों और मानवीय प्रवृत्तियों पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।

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ISBN : 9789389245455

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Publication: Divyansh Publications
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'वयं रक्षामः' आचार्य चतुरसेन की एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक-पौराणिक कृति है, जिसमें प्राचीन भारत की सभ्यता, संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था, राजनीतिक संघर्ष और आर्य-अनार्य संबंधों का विस्तृत चित्रण किया गया है। उपन्यास की कथा उस काल को सामने लाती है, जब विभिन्न जातियों, समुदायों और संस्कृतियों के बीच सत्ता, प्रतिष्ठा और अस्तित्व को लेकर संघर्ष चल रहा था।

कहानी में देव, दैत्य, दानव, नाग, यक्ष और आर्य जैसी विभिन्न सभ्यताओं एवं समुदायों के जीवन का वर्णन मिलता है। लेखक ने इनके माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया है कि प्राचीन समाज केवल एकरूप नहीं था, बल्कि उसमें अनेक संस्कृतियाँ, परंपराएँ और जीवन-दृष्टियाँ साथ-साथ विकसित हो रही थीं। विभिन्न समूहों के बीच संघर्ष के साथ-साथ उनके बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान और संबंधों को भी कथा में स्थान दिया गया है।

उपन्यास में रावण का चरित्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। लेखक ने उसे केवल एक पौराणिक खलनायक के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि एक शक्तिशाली, विद्वान, महत्वाकांक्षी और जटिल व्यक्तित्व के रूप में चित्रित किया है। उसके व्यक्तित्व में नेतृत्व, ज्ञान, पराक्रम और सत्ता की तीव्र इच्छा के साथ-साथ अहंकार और महत्वाकांक्षा भी दिखाई देती है। उसके संघर्षों के माध्यम से उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों और शक्ति-संतुलन को समझने का अवसर मिलता है।

आचार्य चतुरसेन ने इस कृति में इतिहास, पुराण, कल्पना और सामाजिक विश्लेषण का सुंदर संयोजन किया है। वे प्राचीन समाज की जीवन-पद्धति, धार्मिक विश्वासों, पारिवारिक संबंधों, युद्ध-कौशल, स्त्री-पुरुष संबंधों और सांस्कृतिक परंपराओं का विस्तृत चित्र प्रस्तुत करते हैं।

'वयं रक्षामः' का मूल संदेश यह है कि इतिहास को केवल विजेताओं की दृष्टि से नहीं, बल्कि विभिन्न समुदायों और संस्कृतियों के दृष्टिकोण से भी समझना चाहिए। यह कृति पाठकों को प्राचीन भारतीय सभ्यता के विविध रूपों, सत्ता-संघर्षों और मानवीय प्रवृत्तियों पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।

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