Shudro Ka Itihas(शूद्रों का इतिहास)

'शूद्रों का इतिहास' (Who Were the Shudras?) डॉ. भीमराव आंबेडकर की एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक और सामाजिक कृति है, जिसमें उन्होंने शूद्रों की उत्पत्ति, उनकी सामाजिक स्थिति तथा भारतीय वर्ण-व्यवस्था के विकास का गहन अध्ययन प्रस्तुत किया है। इस पुस्तक में आंबेडकर ने वेदों, उपनिषदों, महाभारत, रामायण, पुराणों और अन्य प्राचीन ग्रंथों के आधार पर प्रचलित मान्यताओं की आलोचनात्मक समीक्षा की है।

डॉ. आंबेडकर का मुख्य तर्क है कि शूद्र मूलतः आर्य समाज के ही एक क्षत्रिय वर्ग के लोग थे। समय के साथ ब्राह्मणों और कुछ क्षत्रिय राजाओं के बीच हुए संघर्षों के कारण ब्राह्मणों ने शूद्रों का उपनयन संस्कार (यज्ञोपवीत धारण करने का अधिकार) बंद कर दिया। इसके परिणामस्वरूप वे वैदिक शिक्षा और धार्मिक अधिकारों से वंचित हो गए तथा धीरे-धीरे समाज में उनका स्थान गिरता गया। इस प्रकार शूद्रों को सामाजिक रूप से चौथे वर्ण का दर्जा दे दिया गया।

पुस्तक में आंबेडकर यह भी स्पष्ट करते हैं कि वर्ण-व्यवस्था जन्म पर आधारित नहीं थी, बल्कि समय के साथ इसे कठोर और वंशानुगत बना दिया गया। वे इस धारणा का खंडन करते हैं कि शूद्र किसी विदेशी या अनार्य जाति के थे। उनके अनुसार शूद्रों का पतन सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों का परिणाम था, न कि किसी जैविक या नस्लीय भिन्नता का।

यह कृति केवल इतिहास का अध्ययन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समानता और मानवीय गरिमा की स्थापना का एक सशक्त प्रयास है। डॉ. आंबेडकर तर्क, प्रमाण और ऐतिहासिक विश्लेषण के माध्यम से पाठकों को भारतीय समाज की संरचना पर नए दृष्टिकोण से विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं। 'शूद्रों का इतिहास' सामाजिक असमानता की जड़ों को समझने, जाति-व्यवस्था की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का विश्लेषण करने तथा समानता और न्याय के मूल्यों को स्थापित करने वाली डॉ. आंबेडकर की सबसे महत्वपूर्ण कृतियों में से एक मानी जाती है।

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ISBN : 9789389245820

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Publication: Divyansh Publications
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'शूद्रों का इतिहास' (Who Were the Shudras?) डॉ. भीमराव आंबेडकर की एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक और सामाजिक कृति है, जिसमें उन्होंने शूद्रों की उत्पत्ति, उनकी सामाजिक स्थिति तथा भारतीय वर्ण-व्यवस्था के विकास का गहन अध्ययन प्रस्तुत किया है। इस पुस्तक में आंबेडकर ने वेदों, उपनिषदों, महाभारत, रामायण, पुराणों और अन्य प्राचीन ग्रंथों के आधार पर प्रचलित मान्यताओं की आलोचनात्मक समीक्षा की है।

डॉ. आंबेडकर का मुख्य तर्क है कि शूद्र मूलतः आर्य समाज के ही एक क्षत्रिय वर्ग के लोग थे। समय के साथ ब्राह्मणों और कुछ क्षत्रिय राजाओं के बीच हुए संघर्षों के कारण ब्राह्मणों ने शूद्रों का उपनयन संस्कार (यज्ञोपवीत धारण करने का अधिकार) बंद कर दिया। इसके परिणामस्वरूप वे वैदिक शिक्षा और धार्मिक अधिकारों से वंचित हो गए तथा धीरे-धीरे समाज में उनका स्थान गिरता गया। इस प्रकार शूद्रों को सामाजिक रूप से चौथे वर्ण का दर्जा दे दिया गया।

पुस्तक में आंबेडकर यह भी स्पष्ट करते हैं कि वर्ण-व्यवस्था जन्म पर आधारित नहीं थी, बल्कि समय के साथ इसे कठोर और वंशानुगत बना दिया गया। वे इस धारणा का खंडन करते हैं कि शूद्र किसी विदेशी या अनार्य जाति के थे। उनके अनुसार शूद्रों का पतन सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों का परिणाम था, न कि किसी जैविक या नस्लीय भिन्नता का।

यह कृति केवल इतिहास का अध्ययन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समानता और मानवीय गरिमा की स्थापना का एक सशक्त प्रयास है। डॉ. आंबेडकर तर्क, प्रमाण और ऐतिहासिक विश्लेषण के माध्यम से पाठकों को भारतीय समाज की संरचना पर नए दृष्टिकोण से विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं। 'शूद्रों का इतिहास' सामाजिक असमानता की जड़ों को समझने, जाति-व्यवस्था की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का विश्लेषण करने तथा समानता और न्याय के मूल्यों को स्थापित करने वाली डॉ. आंबेडकर की सबसे महत्वपूर्ण कृतियों में से एक मानी जाती है।

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Dr. B. R. Ambedkar

Dr. B. R. Ambedkar (1891–1956) was a renowned Indian jurist, economist, social reformer, and the chief architect of the Constitution of India. He dedicated his life to fighting social discrimination and promoting equality, justice, and human rights, especially for the marginalized sections of society. As the first Law Minister of independent India, he played a pivotal role in shaping the nation’s democratic framework. His contributions to education, social justice, and constitutional governance continue to inspire millions. Dr. Ambedkar is widely respected as a symbol of equality, empowerment, and social transformation in India.\r\n
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