Jaat-Paat Ka Vinash(जात-पात )

जात-पात का विनाश डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर की एक क्रांतिकारी और विचारोत्तेजक कृति है, जिसमें उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त जाति-प्रथा, छुआछूत और सामाजिक भेदभाव का तार्किक एवं निर्भीक विश्लेषण किया है। यह पुस्तक मूलतः एक भाषण के रूप में लिखी गई थी, जिसे आयोजकों द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने के बाद डॉ. आंबेडकर ने स्वतंत्र रूप से प्रकाशित किया। इसमें उन्होंने स्पष्ट किया है कि जाति-व्यवस्था सामाजिक एकता, मानव समानता और राष्ट्रीय प्रगति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। आंबेडकर का मत है कि जन्म के आधार पर मनुष्य का मूल्यांकन करना अन्यायपूर्ण और अमानवीय है। वे स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को आदर्श समाज की आधारशिला मानते हैं तथा धर्म और समाज में व्याप्त उन रूढ़ियों की आलोचना करते हैं जो जातिगत भेदभाव को बढ़ावा देती हैं। उनके अनुसार किसी भी समाज का वास्तविक विकास तभी संभव है, जब प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार, सम्मान और अवसर प्राप्त हों। जात-पात का विनाश केवल सामाजिक व्यवस्था की आलोचना नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण और समतामूलक समाज के निर्माण का घोषणापत्र है। यह कृति पाठकों को मानवता, सामाजिक न्याय, वैज्ञानिक सोच और लोकतांत्रिक मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा देती है तथा यह संदेश देती है कि जात-पात से मुक्त, समानता और भाईचारे पर आधारित समाज ही सच्चे अर्थों में प्रगतिशील और लोकतांत्रिक समाज हो सकता है।

₹ 200.00 ₹249

Inclusive of all taxes

ISBN : 9789389245400

  • 1

    Warranty

  • 1 Guarantee

  • COD Avilable

  • Returnable

  • cancelable

SKU: JPK-DIV
Publication: Divyansh Publication
Description:
जात-पात का विनाश डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर की एक क्रांतिकारी और विचारोत्तेजक कृति है, जिसमें उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त जाति-प्रथा, छुआछूत और सामाजिक भेदभाव का तार्किक एवं निर्भीक विश्लेषण किया है। यह पुस्तक मूलतः एक भाषण के रूप में लिखी गई थी, जिसे आयोजकों द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने के बाद डॉ. आंबेडकर ने स्वतंत्र रूप से प्रकाशित किया। इसमें उन्होंने स्पष्ट किया है कि जाति-व्यवस्था सामाजिक एकता, मानव समानता और राष्ट्रीय प्रगति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। आंबेडकर का मत है कि जन्म के आधार पर मनुष्य का मूल्यांकन करना अन्यायपूर्ण और अमानवीय है। वे स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को आदर्श समाज की आधारशिला मानते हैं तथा धर्म और समाज में व्याप्त उन रूढ़ियों की आलोचना करते हैं जो जातिगत भेदभाव को बढ़ावा देती हैं। उनके अनुसार किसी भी समाज का वास्तविक विकास तभी संभव है, जब प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार, सम्मान और अवसर प्राप्त हों। जात-पात का विनाश केवल सामाजिक व्यवस्था की आलोचना नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण और समतामूलक समाज के निर्माण का घोषणापत्र है। यह कृति पाठकों को मानवता, सामाजिक न्याय, वैज्ञानिक सोच और लोकतांत्रिक मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा देती है तथा यह संदेश देती है कि जात-पात से मुक्त, समानता और भाईचारे पर आधारित समाज ही सच्चे अर्थों में प्रगतिशील और लोकतांत्रिक समाज हो सकता है।

Submit a Review

Write Your Review

0 Review Of Product Jaat-Paat Ka Vinash(जात-पात )

Dr. B. R. Ambedkar

Dr. B. R. Ambedkar (1891–1956) was a renowned Indian jurist, economist, social reformer, and the chief architect of the Constitution of India. He dedicated his life to fighting social discrimination and promoting equality, justice, and human rights, especially for the marginalized sections of society. As the first Law Minister of independent India, he played a pivotal role in shaping the nation’s democratic framework. His contributions to education, social justice, and constitutional governance continue to inspire millions. Dr. Ambedkar is widely respected as a symbol of equality, empowerment, and social transformation in India.\r\n
Forgot Password?
OR

No account Yet?