Achoot Kaun The Or Ve Achoot Kaise Bane(अछूत कौन थे और वे अछूत कैसे बने)

डॉ. भीमराव आंबेडकर की पुस्तक 'अछूत कौन थे और वे अछूत कैसे बने' भारतीय समाज में अस्पृश्यता की उत्पत्ति और उसके ऐतिहासिक कारणों का गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इस पुस्तक में लेखक ने यह स्थापित करने का प्रयास किया है कि अछूत कोई अलग नस्ल या विदेशी समुदाय नहीं थे, बल्कि वे भारत के मूल समाज का ही हिस्सा थे। डॉ. आंबेडकर के अनुसार प्राचीन काल में कुछ समुदाय बौद्ध धर्म के अनुयायी थे और उन्होंने ब्राह्मणवादी धार्मिक परंपराओं तथा सामाजिक रीति-रिवाजों को स्वीकार नहीं किया। इसके अतिरिक्त गौमांस-भक्षण जैसी प्रथाओं को लेकर भी सामाजिक मतभेद उत्पन्न हुए। समय के साथ धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों के कारण इन समुदायों को समाज से अलग कर दिया गया तथा उन्हें अस्पृश्य घोषित कर दिया गया। पुस्तक में इतिहास, धर्मग्रंथों, सामाजिक परंपराओं और उपलब्ध प्रमाणों का विश्लेषण करते हुए लेखक ने स्पष्ट किया है कि अस्पृश्यता किसी दैवी व्यवस्था का परिणाम नहीं, बल्कि मनुष्य द्वारा निर्मित सामाजिक भेदभाव है। यह कृति जाति-व्यवस्था की कठोर आलोचना करते हुए समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और सामाजिक न्याय के मूल्यों को स्थापित करने का संदेश देती है। साथ ही यह पाठकों को मानव गरिमा का सम्मान करने तथा भेदभावमुक्त, समतामूलक और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिए प्रेरित करती है।

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ISBN : 9789389245936

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Publication: Divyansh Publication
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डॉ. भीमराव आंबेडकर की पुस्तक 'अछूत कौन थे और वे अछूत कैसे बने' भारतीय समाज में अस्पृश्यता की उत्पत्ति और उसके ऐतिहासिक कारणों का गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इस पुस्तक में लेखक ने यह स्थापित करने का प्रयास किया है कि अछूत कोई अलग नस्ल या विदेशी समुदाय नहीं थे, बल्कि वे भारत के मूल समाज का ही हिस्सा थे। डॉ. आंबेडकर के अनुसार प्राचीन काल में कुछ समुदाय बौद्ध धर्म के अनुयायी थे और उन्होंने ब्राह्मणवादी धार्मिक परंपराओं तथा सामाजिक रीति-रिवाजों को स्वीकार नहीं किया। इसके अतिरिक्त गौमांस-भक्षण जैसी प्रथाओं को लेकर भी सामाजिक मतभेद उत्पन्न हुए। समय के साथ धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों के कारण इन समुदायों को समाज से अलग कर दिया गया तथा उन्हें अस्पृश्य घोषित कर दिया गया। पुस्तक में इतिहास, धर्मग्रंथों, सामाजिक परंपराओं और उपलब्ध प्रमाणों का विश्लेषण करते हुए लेखक ने स्पष्ट किया है कि अस्पृश्यता किसी दैवी व्यवस्था का परिणाम नहीं, बल्कि मनुष्य द्वारा निर्मित सामाजिक भेदभाव है। यह कृति जाति-व्यवस्था की कठोर आलोचना करते हुए समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और सामाजिक न्याय के मूल्यों को स्थापित करने का संदेश देती है। साथ ही यह पाठकों को मानव गरिमा का सम्मान करने तथा भेदभावमुक्त, समतामूलक और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिए प्रेरित करती है।

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Dr. B. R. Ambedkar

Dr. B. R. Ambedkar (1891–1956) was a renowned Indian jurist, economist, social reformer, and the chief architect of the Constitution of India. He dedicated his life to fighting social discrimination and promoting equality, justice, and human rights, especially for the marginalized sections of society. As the first Law Minister of independent India, he played a pivotal role in shaping the nation’s democratic framework. His contributions to education, social justice, and constitutional governance continue to inspire millions. Dr. Ambedkar is widely respected as a symbol of equality, empowerment, and social transformation in India.\r\n
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