Mrityubhoj(मृत्युभोज)

'मृत्युभोज' बालेंदु द्विवेदी का एक महत्वपूर्ण सामाजिक उपन्यास है, जो भारतीय समाज में प्रचलित मृत्युभोज जैसी कुप्रथा और उससे उत्पन्न आर्थिक, सामाजिक तथा मानसिक समस्याओं को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है। लेखक ने दिखाया है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद शोकग्रस्त परिवार पर समाज की परंपराओं और सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर मृत्युभोज आयोजित करने का भारी दबाव बनाया जाता है। परिणामस्वरूप अनेक परिवार अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करने, कर्ज लेने और आर्थिक संकट में फँसने के लिए विवश हो जाते हैं।

उपन्यास में ग्रामीण जीवन, सामाजिक संबंधों और सामुदायिक मानसिकता का यथार्थ चित्रण किया गया है। लेखक बताता है कि समाज में कई लोग इस प्रथा को सम्मान और परंपरा का प्रतीक मानते हैं, जबकि वास्तव में यह शोकग्रस्त परिवार पर अतिरिक्त बोझ डालती है। परिवार अपने भविष्य, बच्चों की शिक्षा और आवश्यक जरूरतों की उपेक्षा करके केवल सामाजिक आलोचना से बचने के लिए अनावश्यक खर्च करता है। इस प्रकार मृत्युभोज संवेदना का नहीं, बल्कि दिखावे और सामाजिक दबाव का माध्यम बन जाता है।

बालेंदु द्विवेदी ने उपन्यास के माध्यम से अंधविश्वास, रूढ़िवादिता, सामाजिक प्रतिष्ठा की झूठी भावना और सामूहिक दबाव की तीखी आलोचना की है। साथ ही वे यह संदेश देते हैं कि मृतक के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि भव्य भोज नहीं, बल्कि उसके आदर्शों का पालन, परिवार की सहायता और मानवीय संवेदनाओं का सम्मान है। लेखक यह भी रेखांकित करते हैं कि समाज में परिवर्तन तभी संभव है, जब लोग विवेकपूर्ण सोच अपनाएँ और हानिकारक परंपराओं का साहसपूर्वक विरोध करें।

'मृत्युभोज' केवल एक सामाजिक कुप्रथा का चित्रण नहीं, बल्कि भारतीय ग्रामीण समाज की मानसिकता, आर्थिक विषमता और सामाजिक दबावों का गहन विश्लेषण है। सरल, प्रभावशाली और संवेदनशील भाषा में लिखा गया यह उपन्यास पाठकों को सामाजिक कुरीतियों पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है तथा मानवता, सहानुभूति और सामाजिक सुधार का संदेश देता है।

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ISBN : 9789389245059

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Publication: Divyansh Publication
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'मृत्युभोज' बालेंदु द्विवेदी का एक महत्वपूर्ण सामाजिक उपन्यास है, जो भारतीय समाज में प्रचलित मृत्युभोज जैसी कुप्रथा और उससे उत्पन्न आर्थिक, सामाजिक तथा मानसिक समस्याओं को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है। लेखक ने दिखाया है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद शोकग्रस्त परिवार पर समाज की परंपराओं और सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर मृत्युभोज आयोजित करने का भारी दबाव बनाया जाता है। परिणामस्वरूप अनेक परिवार अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करने, कर्ज लेने और आर्थिक संकट में फँसने के लिए विवश हो जाते हैं।

उपन्यास में ग्रामीण जीवन, सामाजिक संबंधों और सामुदायिक मानसिकता का यथार्थ चित्रण किया गया है। लेखक बताता है कि समाज में कई लोग इस प्रथा को सम्मान और परंपरा का प्रतीक मानते हैं, जबकि वास्तव में यह शोकग्रस्त परिवार पर अतिरिक्त बोझ डालती है। परिवार अपने भविष्य, बच्चों की शिक्षा और आवश्यक जरूरतों की उपेक्षा करके केवल सामाजिक आलोचना से बचने के लिए अनावश्यक खर्च करता है। इस प्रकार मृत्युभोज संवेदना का नहीं, बल्कि दिखावे और सामाजिक दबाव का माध्यम बन जाता है।

बालेंदु द्विवेदी ने उपन्यास के माध्यम से अंधविश्वास, रूढ़िवादिता, सामाजिक प्रतिष्ठा की झूठी भावना और सामूहिक दबाव की तीखी आलोचना की है। साथ ही वे यह संदेश देते हैं कि मृतक के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि भव्य भोज नहीं, बल्कि उसके आदर्शों का पालन, परिवार की सहायता और मानवीय संवेदनाओं का सम्मान है। लेखक यह भी रेखांकित करते हैं कि समाज में परिवर्तन तभी संभव है, जब लोग विवेकपूर्ण सोच अपनाएँ और हानिकारक परंपराओं का साहसपूर्वक विरोध करें।

'मृत्युभोज' केवल एक सामाजिक कुप्रथा का चित्रण नहीं, बल्कि भारतीय ग्रामीण समाज की मानसिकता, आर्थिक विषमता और सामाजिक दबावों का गहन विश्लेषण है। सरल, प्रभावशाली और संवेदनशील भाषा में लिखा गया यह उपन्यास पाठकों को सामाजिक कुरीतियों पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है तथा मानवता, सहानुभूति और सामाजिक सुधार का संदेश देता है।

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Balendu Dwivedi

Balendu Dwivedi is a contemporary Hindi writer, editor, and literary scholar known for his significant contributions to modern Hindi literature. His writings reflect a deep understanding of Indian society, culture, and human relationships. As an editor, he has played an important role in promoting literary discourse and bringing valuable works to readers. Through his essays, criticism, and editorial work, Dwivedi has earned recognition for his insightful perspective and commitment to the development of Hindi language and literature.\r\n
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