Author: Premchand
Nirmla
निर्मला मुंशी प्रेमचंद का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक उपन्यास है, जो 1927 में प्रकाशित हुआ था। यह उपन्यास भारतीय समाज में व्याप्त दहेज प्रथा, अनमेल विवाह, स्त्री-असमानता और पारिवारिक अविश्वास जैसी गंभीर समस्याओं को अत्यंत मार्मिकता के साथ प्रस्तुत करता है।
उपन्यास की नायिका निर्मला एक सुशिक्षित, सुंदर और संस्कारी युवती है। उसके विवाह की तैयारियाँ एक योग्य युवक से चल रही होती हैं, किंतु पिता की आकस्मिक मृत्यु और दहेज संबंधी समस्याओं के कारण उसका विवाह उससे कहीं अधिक आयु के विधुर वकील मुंशी तोताराम से कर दिया जाता है। इस अनमेल विवाह के कारण निर्मला को मानसिक और भावनात्मक संघर्षों का सामना करना पड़ता है।
तोताराम के मन में निर्मला और अपने युवा पुत्र मंसाराम के संबंधों को लेकर संदेह उत्पन्न हो जाता है। यह निराधार शंका पूरे परिवार के लिए दुख और विनाश का कारण बनती है। अविश्वास, सामाजिक बंधनों और परिस्थितियों के दबाव में परिवार का सुख-शांत जीवन धीरे-धीरे बिखर जाता है। अंततः निर्मला का जीवन भी गहन पीड़ा और त्याग का प्रतीक बन जाता है।
प्रेमचंद ने इस उपन्यास के माध्यम से यह दिखाया है कि दहेज प्रथा और अनमेल विवाह केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक त्रासदी हैं, जो अनेक जीवनों को प्रभावित करती हैं। निर्मला भारतीय समाज की कुरीतियों पर तीखा प्रहार करने वाली एक यथार्थवादी कृति है। इसमें स्त्री के दुख, त्याग, सहनशीलता और सामाजिक अन्याय का अत्यंत संवेदनशील चित्रण मिलता है। यही कारण है कि यह उपन्यास आज भी हिंदी साहित्य की सर्वाधिक चर्चित और प्रासंगिक कृतियों में गिना जाता है।
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Publication: Divyansh Publications
Description:
निर्मला मुंशी प्रेमचंद का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक उपन्यास है, जो 1927 में प्रकाशित हुआ था। यह उपन्यास भारतीय समाज में व्याप्त दहेज प्रथा, अनमेल विवाह, स्त्री-असमानता और पारिवारिक अविश्वास जैसी गंभीर समस्याओं को अत्यंत मार्मिकता के साथ प्रस्तुत करता है।
उपन्यास की नायिका निर्मला एक सुशिक्षित, सुंदर और संस्कारी युवती है। उसके विवाह की तैयारियाँ एक योग्य युवक से चल रही होती हैं, किंतु पिता की आकस्मिक मृत्यु और दहेज संबंधी समस्याओं के कारण उसका विवाह उससे कहीं अधिक आयु के विधुर वकील मुंशी तोताराम से कर दिया जाता है। इस अनमेल विवाह के कारण निर्मला को मानसिक और भावनात्मक संघर्षों का सामना करना पड़ता है।
तोताराम के मन में निर्मला और अपने युवा पुत्र मंसाराम के संबंधों को लेकर संदेह उत्पन्न हो जाता है। यह निराधार शंका पूरे परिवार के लिए दुख और विनाश का कारण बनती है। अविश्वास, सामाजिक बंधनों और परिस्थितियों के दबाव में परिवार का सुख-शांत जीवन धीरे-धीरे बिखर जाता है। अंततः निर्मला का जीवन भी गहन पीड़ा और त्याग का प्रतीक बन जाता है।
प्रेमचंद ने इस उपन्यास के माध्यम से यह दिखाया है कि दहेज प्रथा और अनमेल विवाह केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक त्रासदी हैं, जो अनेक जीवनों को प्रभावित करती हैं। निर्मला भारतीय समाज की कुरीतियों पर तीखा प्रहार करने वाली एक यथार्थवादी कृति है। इसमें स्त्री के दुख, त्याग, सहनशीलता और सामाजिक अन्याय का अत्यंत संवेदनशील चित्रण मिलता है। यही कारण है कि यह उपन्यास आज भी हिंदी साहित्य की सर्वाधिक चर्चित और प्रासंगिक कृतियों में गिना जाता है।
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