Author: Boddhacharya Prakash Ratan Gautam(बौद्धाचार्य प्रकाश रत्न गौतम)
Mahamanav Buddha Or Buddhacharya Ka Shikshan-Prashikshan(महामानव बुद्ध और बौद्धाचार्यों का शिक्षण-प्रशिक्षण)
'महामानव बुद्ध और बौद्धाचार्यों का शिक्षण-प्रशिक्षण' एक शोधपरक एवं ज्ञानवर्धक कृति है, जिसमें भगवान बुद्ध की शिक्षा-पद्धति तथा बौद्धाचार्यों द्वारा विकसित शिक्षण-प्रशिक्षण परंपरा का विस्तृत विवेचन किया गया है। पुस्तक में बताया गया है कि बुद्ध का उद्देश्य केवल धार्मिक उपदेश देना नहीं था, बल्कि ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करना था जो नैतिक, विवेकशील, करुणामय और समाजोपयोगी हो। उनकी शिक्षा संवाद, तर्क, अनुभव और आत्मचिंतन पर आधारित थी, जिससे प्रत्येक व्यक्ति स्वयं सत्य का बोध कर सके। लेखक ने संघ व्यवस्था, गुरु-शिष्य संबंध, अनुशासन, ध्यान, प्रज्ञा, शील और सम्यक आचरण को बौद्ध शिक्षा की आधारशिला के रूप में प्रस्तुत किया है। पुस्तक में यह भी स्पष्ट किया गया है कि बौद्धाचार्यों ने शिक्षा को जाति, वर्ग और लिंग के भेदभाव से ऊपर उठाकर सभी के लिए सुलभ बनाया तथा ज्ञान को सामाजिक परिवर्तन का प्रभावी माध्यम माना। नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसी शिक्षण परंपराओं के योगदान का भी उल्लेख किया गया है। यह कृति दर्शाती है कि बौद्ध शिक्षा केवल बौद्धिक विकास तक सीमित नहीं थी, बल्कि चरित्र निर्माण, आत्मानुशासन, सहिष्णुता, मानवता और लोककल्याण की भावना को विकसित करने का सशक्त माध्यम थी। यह पुस्तक शिक्षाशास्त्र, बौद्ध दर्शन और भारतीय शिक्षा परंपरा के अध्ययन में अत्यंत उपयोगी एवं प्रेरणादायक है।
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ISBN : 9789393434517
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Publication: Divyansh Publication
Description:
'महामानव बुद्ध और बौद्धाचार्यों का शिक्षण-प्रशिक्षण' एक शोधपरक एवं ज्ञानवर्धक कृति है, जिसमें भगवान बुद्ध की शिक्षा-पद्धति तथा बौद्धाचार्यों द्वारा विकसित शिक्षण-प्रशिक्षण परंपरा का विस्तृत विवेचन किया गया है। पुस्तक में बताया गया है कि बुद्ध का उद्देश्य केवल धार्मिक उपदेश देना नहीं था, बल्कि ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करना था जो नैतिक, विवेकशील, करुणामय और समाजोपयोगी हो। उनकी शिक्षा संवाद, तर्क, अनुभव और आत्मचिंतन पर आधारित थी, जिससे प्रत्येक व्यक्ति स्वयं सत्य का बोध कर सके। लेखक ने संघ व्यवस्था, गुरु-शिष्य संबंध, अनुशासन, ध्यान, प्रज्ञा, शील और सम्यक आचरण को बौद्ध शिक्षा की आधारशिला के रूप में प्रस्तुत किया है। पुस्तक में यह भी स्पष्ट किया गया है कि बौद्धाचार्यों ने शिक्षा को जाति, वर्ग और लिंग के भेदभाव से ऊपर उठाकर सभी के लिए सुलभ बनाया तथा ज्ञान को सामाजिक परिवर्तन का प्रभावी माध्यम माना। नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसी शिक्षण परंपराओं के योगदान का भी उल्लेख किया गया है। यह कृति दर्शाती है कि बौद्ध शिक्षा केवल बौद्धिक विकास तक सीमित नहीं थी, बल्कि चरित्र निर्माण, आत्मानुशासन, सहिष्णुता, मानवता और लोककल्याण की भावना को विकसित करने का सशक्त माध्यम थी। यह पुस्तक शिक्षाशास्त्र, बौद्ध दर्शन और भारतीय शिक्षा परंपरा के अध्ययन में अत्यंत उपयोगी एवं प्रेरणादायक है।
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